
सिर्फ सोनोग्राफी करने से नहीं बनेगा आरोपी डॉक्टर, हाईकोर्ट ने रद्द किया पॉक्सो केस
बिलासपुर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: अपराध की जानकारी न हो तो सूचना न देने पर नहीं होगी कार्रवाई
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि किसी चिकित्सक को किसी यौन अपराध की जानकारी या उसका संदेह नहीं है, तो केवल नाबालिग की सामान्य चिकित्सकीय जांच या सोनोग्राफी करने के आधार पर उसके खिलाफ पॉक्सो एक्ट की धारा-21 के तहत आपराधिक कार्रवाई नहीं की जा सकती। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने राजनांदगांव की रेडियोलॉजिस्ट डॉ. आरती उइके के खिलाफ दर्ज एफआईआर और पुलिस द्वारा पेश की गई पूरक चार्जशीट को निरस्त कर दिया।
बताया गया कि फरवरी 2025 में राजनांदगांव की एक 15 वर्षीय किशोरी गर्भवती हो गई थी। परिजन उसे सोनोग्राफी के लिए डॉ. आरती उइके के डायग्नोस्टिक सेंटर लेकर पहुंचे, जहां सामान्य चिकित्सा प्रक्रिया के तहत जांच की गई। बाद में किशोरी ने बच्चे को जन्म दिया और उसे गोद दे दिया गया। वर्ष के अंत में शिकायत दर्ज होने के बाद पुलिस ने मामले की जांच शुरू की और यह आरोप लगाते हुए कि डॉक्टर ने नाबालिग की गर्भावस्था की सूचना पुलिस को नहीं दी, मार्च 2026 में उनके खिलाफ पॉक्सो एक्ट की धारा-21 के तहत मामला दर्ज कर गिरफ्तार कर लिया। जमानत मिलने के बाद पुलिस ने पूरक चालान भी पेश कर दिया, जिसके खिलाफ डॉक्टर ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि डॉक्टर ने पीसी-पीएनडीटी कानून के तहत सभी आवश्यक औपचारिकताओं का पालन किया था और जांच के दौरान न तो पीड़िता और न ही उसके परिजनों ने किसी यौन अपराध की जानकारी दी थी। वहीं राज्य सरकार की ओर से तर्क दिया गया कि नाबालिग की गर्भावस्था सामने आने पर पुलिस को सूचना देना डॉक्टर की जिम्मेदारी थी।
हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कहा कि पॉक्सो एक्ट की धारा-19 के तहत सूचना देने का दायित्व तभी उत्पन्न होता है, जब संबंधित व्यक्ति को किसी यौन अपराध की जानकारी हो या उसका उचित संदेह हो। केवल सामान्य चिकित्सकीय जांच करने मात्र से डॉक्टर को आरोपी नहीं बनाया जा सकता। इसी आधार पर अदालत ने डॉ. आरती उइके के खिलाफ दर्ज आपराधिक प्रकरण और पुलिस की पूरक चार्जशीट दोनों को रद्द कर दिया।
फैसले की अहम बातें
अपराध की जानकारी या संदेह होने पर ही सूचना देना अनिवार्य।
सामान्य चिकित्सकीय जांच या सोनोग्राफी करना अपराध नहीं।
डॉक्टर को बिना पर्याप्त आधार के पॉक्सो एक्ट में आरोपी नहीं बनाया जा सकता।
हाईकोर्ट ने एफआईआर और पूरक चार्जशीट दोनों निरस्त कीं।
