
हाथी गांव में पहुंचे, उससे पहले पहुंचेगा अलर्ट
छत्तीसगढ़ का ‘गजसंकेत’ मॉडल बना देश में चर्चा का विषय, नीति आयोग की फ्रंटियर टेक पहल में मिली जगह
रायपुर। जंगलों से लगे गांवों में मानव-हाथी संघर्ष रोकने के लिए छत्तीसगढ़ ने तकनीक और जमीनी निगरानी को जोड़कर एक प्रभावी मॉडल तैयार किया है। राज्य का ‘गजसंकेत’ नवाचार अब राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना रहा है। नीति आयोग की फ्रंटियर टेक पहल में इसे देश के प्रमुख तकनीकी नवाचारों में शामिल किया गया है। इस व्यवस्था की खासियत यह है कि हाथियों के गांव में पहुंचने का इंतजार नहीं किया जाता, बल्कि उनकी गतिविधियों के आधार पर संभावित खतरे वाले गांवों की पहले ही पहचान कर ग्रामीणों को सतर्क किया जाता है।
हाथियों की लोकेशन से तय होता है खतरे का दायरा
गजसंकेत की शुरुआत जंगल में तैनात वनकर्मियों और हाथी निगरानी दलों से होती है। टीम हाथियों की लोकेशन, झुंड की दिशा और उनकी गतिविधियों की जानकारी जुटाती है। यह जानकारी जीपीएस और जीआईएस तकनीक के माध्यम से सिस्टम तक पहुंचती है। इसके बाद जियो-फेंसिंग की मदद से यह निर्धारित किया जाता है कि हाथियों की संभावित आवाजाही के दायरे में कौन-कौन से गांव आ सकते हैं।
संभावित खतरे वाले गांवों की पहचान होते ही ग्रामीणों और वन विभाग के संबंधित कर्मचारियों को एसएमएस, वाट्सऐप और वॉयस मैसेज के जरिए अलर्ट भेज दिया जाता है। इससे लोगों को पहले से सावधानी बरतने का समय मिल जाता है और वन अमला भी मौके पर पहुंचकर आवश्यक कदम उठा सकता है।
एआई के साथ जमीनी निगरानी का तालमेल
गजसंकेत की सफलता केवल कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर निर्भर नहीं है। इसमें वनकर्मियों की जमीनी जानकारी और आधुनिक तकनीक को एक साथ इस्तेमाल किया गया है। फील्ड स्टाफ हाथियों की वास्तविक गतिविधियों की जानकारी उपलब्ध कराता है, जबकि तकनीकी प्रणाली इस जानकारी का विश्लेषण कर संभावित खतरे की चेतावनी तैयार करती है।
इस व्यवस्था में एआई, जीपीएस, जीआईएस, जियो-फेंसिंग, रियल टाइम अलर्ट, पैदल गश्त और ग्रामीणों की भागीदारी को जोड़ा गया है। नेटवर्क या इंटरनेट की सुविधा कमजोर होने वाले इलाकों में मुनादी और पारंपरिक सूचना तंत्र का भी सहारा लिया जाता है। यानी तकनीक वनकर्मियों का विकल्प नहीं, बल्कि उनकी निगरानी और कार्रवाई को अधिक प्रभावी बनाने का माध्यम बनी है।
संघर्ष की घटनाओं में आई बड़ी कमी
नीति आयोग की केस स्टडी में गजसंकेत से जुड़े प्रयासों के प्रभाव का भी उल्लेख किया गया है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक राज्य में मानव-हाथी संघर्ष की घटनाएं 2022-23 में 445 से घटकर 2024-25 में 107 रह गईं। इसी दौरान मुआवजा भुगतान की राशि भी करीब 79 लाख रुपये से घटकर 19 लाख रुपये रह गई।
उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व का उदाहरण भी इस मॉडल की सफलता को सामने रखता है। नीति आयोग की केस स्टडी के अनुसार, वहां ऐसे हस्तक्षेप लागू किए जाने के बाद 21 महीने तक मानव या हाथी की मृत्यु दर्ज नहीं हुई।
सितंबर 2025 तक भेजे गए 60 लाख से अधिक अलर्ट
गजसंकेत की व्यापक पहुंच का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि सितंबर 2025 तक छत्तीसगढ़ में करीब 60 लाख अलर्ट जारी किए जा चुके थे। इनका उद्देश्य हाथियों की संभावित गतिविधियों वाले क्षेत्रों में रहने वाले लोगों और वन विभाग के अमले तक समय पर सूचना पहुंचाना है।
अलर्ट जितनी जल्दी ग्रामीणों तक पहुंचता है, उनके पास सावधानी बरतने और सुरक्षित स्थान पर रहने का उतना ही अधिक समय होता है। यही वजह है कि गजसंकेत को महज सूचना देने वाली व्यवस्था के बजाय पूर्व चेतावनी और बचाव की प्रणाली के रूप में देखा जा रहा है।
कम लागत में तैयार किया गया मॉडल
गजसंकेत की एक महत्वपूर्ण विशेषता इसकी लागत प्रभावशीलता भी है। महंगे और बड़े तकनीकी ढांचे पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों, वनकर्मियों की जानकारी और ग्रामीणों की भागीदारी को तकनीक से जोड़ा गया है। इससे इसे बड़े वन क्षेत्रों में अपेक्षाकृत कम लागत में लागू करना संभव हो रहा है।
हादसे के बाद नहीं, खतरे से पहले कार्रवाई
मानव-हाथी संघर्ष को रोकने में गजसंकेत की सबसे अहम बात इसकी ‘पहले चेतावनी, फिर कार्रवाई’ की रणनीति है। हाथियों की गतिविधि की निगरानी से लेकर उनकी लोकेशन, संभावित मार्ग और खतरे में आने वाले गांवों की पहचान तक
पूरी प्रक्रिया को एक-दूसरे से जोड़ा गया है।
इसका मकसद हाथी और इंसान के आमने-सामने आने की स्थिति बनने से पहले ही ग्रामीणों को सावधान करना और वन अमले को सक्रिय करना है। नीति आयोग की फ्रंटियर टेक पहल में जगह मिलने से छत्तीसगढ़ का यह प्रयोग अब दूसरे राज्यों के लिए भी मानव-वन्यजीव संघर्ष से निपटने का एक संभावित मॉडल बनकर सामने आया है।
